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पंकज त्रिपाठी
देवकीनंदन ठाकुर की कथा में छठवे दिन पहुँचें लगभग एक लाख श्रोतागण
भिण्ड । भुमिया सरकार पर भूमिया सरकार के पीठाधीश्वर श्री हरिओम दास जी के द्वारा कराई जा रही विश्वविख्यात कथा वाचक श्री देवकीनदंन ठाकुर जी के मुखार बिन्द से श्रीमद भागवत कथा के आज छठवे दिन श्रद्धालुओं का जमाबड़ा कथा प्रारम्भ होने से पहले ही लगना शुरू हो गया था और देखते ही देखते सभी पण्डाल पूरी तरह से भर चुके थे। और आज कथा सुनने के लिए लगभग एक से डेढ़ लाख श्रद्धालु पहुँच गये। भीषण गर्मी में पण्डाल पूरी तरह से भरा देख कथावाचक देवकीनदंन ठाकुर ने कहा कि इसी को मेहगाँव कहते हैं, प्रतिदिन संख्या बढ़ती जा रही है ठाकुरजी हर भक्त को कथा तक खींच ला रहे हैं।
जानकारी के अनुसार राष्ट्रीय कथावाचक देवकीनंदन ठाकुर ने कथा के छठवे दिन पवित्र गोवर्धन पर्वत की कथा सुनाते हुये उन्होंने कहा यह वही पर्वत है जिसे ठाकुर जी ने अपनी एक उंगली पर उठा लिया था, और बृजवासियों की रक्षा की थी।श्रीकृष्ण ने देवराज इंद्र के सर्वशक्तिमान और श्रेष्ठ होने के अहंकार को भी भंग किया था। इसलिए कहा जाता है कि गोवर्धन पर्वत का उत्सव हर किसी को मनाना चाहिए। देवराज इंद्र का अभिमान चूर करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने एक लीला रची थी जब उन्होंने देखा कि एक दिन सभी बृजवासी उत्तम पकवान बना रहे हैं।और किसी की पूजा की तैयारी में जुटे हुये हैं। तो उन्होंने यशोदा मैया से पूछा कि आप लोग किस देवता की पूजा की तैयारी कर रही हो इस पर माता यशोदा ने बताया कि सब लोग देवराज इंद्र की पूजा के लिए अन्नकूट की तैयारी कर रहे हैं।तो उन्होंने फिर पूछा कि इन्द्र की पूजा क्यों करते हो माता ने बताया कि वह वर्षा करते हैं, जिससे अन्न पैदा होता है और हमारी गायों को चारा मिलता है। तब श्रीकृष्ण ने कहा ऐसा है तो सबको गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए क्योंकि हमारी गायें वहीं चरती है।और इंद्र तो कभी दर्शन भी नहीं देते पूजा न करने पर इंद्र क्रोधित भी होते हैं तो हम लोग गोवर्धन की पूजा क्यों नहीं करते हैं। इसी बात पर इंद्र ने मूसलाधार बारिष शुरू कर दी और लगातार बारिष होने से जब इंद्र थक गये तो वह आकर भगवान अपने कृत्य की गलती मानते हुये कहा कि भगवान हमसे बहुत बड़ी भूल हो गई। तभी से इंद्र की जगह गोवर्धन पर्वत की पूजा होने लगी है जो हम सभी लोग प्रतिवर्ष गोवर्धन की पूजा करते हैं। कथा के बीच श्री कथावाचक ठाकुरजी ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण और रूकमणी की कथा का भी वर्णन करते हुये कहा कि रूकमणी भगवान श्रीकृष्ण की इकलौती पत्नी और रानीं थी। रूकमणी को लक्ष्मी का अवतार माना जाता है, रूकमणी ने श्रीकृष्ण से प्रेम विवाह किया था।




