जी भारत न्यूज24
उत्तर प्रदेश में सीयूजी (CUG) व्यवस्था पर बड़ा सवाल: अधिकारी नहीं उठाते फोन, या तो मिलता है स्विच ऑफ या जूनियर कर्मचारी देकर टाल देते हैं कोरा आश्वासन
ब्यूरो रिपोर्ट: देवेश प्रताप सिंह राठौर (Zee Bharat News 24)
उत्तर प्रदेश। उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक अमले में जनता की सहूलियत और तत्काल जनसुनवाई के लिए जारी किए गए सीयूजी (Closed User Group) नंबर आज के दौर में पूरी तरह अपनी प्रासंगिकता खो चुके हैं। सरकार भले ही पारदर्शी प्रशासन और ‘सरकार आपके द्वार’ का दावा करे, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि प्रदेश के लगभग सभी जिलों में वरिष्ठ अधिकारी इन सीयूजी नंबरों को अटेंड करना अपनी तौहीन समझते हैं। आम जनता के लिए ये नंबर महज एक ‘शोपीस’ बनकर रह गए हैं।
सेव नंबरों को तवज्जो, अंजान नंबरों से दूरी
जिले स्तर से लेकर प्रदेश स्तर के बड़े अधिकारियों और मंत्रियों के सीयूजी मोबाइल की हकीकत यह है कि उनमें जो नंबर पहले से सेव हैं, केवल उन्हीं को अटेंड किया जाता है। किसी आम आदमी या पीड़ित का फोन आए, तो उसे सीधे तौर पर नजरअंदाज कर दिया जाता है। अधिकतर विभागों के बड़े साहबों के सीयूजी नंबर या तो स्विच ऑफ मिलते हैं या फिर ‘नॉट रीचेबल’।
अगर कभी गलती से फोन उठ भी जाए, तो साहब खुद बात नहीं करते। विभाग का कोई अदना सा कर्मचारी फोन उठाता है, औपचारिकता के लिए समस्या पूछता है और फिर बात वहीं रफा-दफा हो जाती है। पीड़ित की आवाज सक्षम अधिकारी तक तुरंत पहुंच सके, ऐसा इन सीयूजी नंबरों से अब बिल्कुल भी संभव नहीं रह गया है।
तर्क- ‘फोन बहुत आते हैं’, हकीकत- ‘अहमियत खत्म हो रही है’
जब इस संदर्भ में विभागीय गलियारों से जानकारी चाही गई, तो अक्सर एक ही घिसा-पिटा जवाब मिलता है— “साहब के पास इतने फोन आते हैं कि वह परेशान हो जाते हैं।” यह बात मानी जा सकती है कि फोन अधिक आते होंगे, लेकिन अब सीयूजी नंबरों का महत्व इस कदर खत्म हो रहा है कि लोग हताश होकर खुद ही फोन करना कम कर चुके हैं।
स्पष्ट तौर पर देखा जाए तो सीयूजी नंबर पर फोन वही आम आदमी या गरीब करता है जिसकी कोई ऊंची पहुंच नहीं होती। वह भी अधिकारी के रौब से डरते-डरते फोन लगाता है, लेकिन जब वहां से कोई रिस्पॉन्स नहीं मिलता, तो उसका व्यवस्था से भरोसा उठ जाता है।
महाबलियों और रसूखदारों के पास हैं पर्सनल नंबर; आम आदमी क्यों रहे दूर?
इस पूरी व्यवस्था का सबसे कड़वा सच यह है कि मंत्रियों, प्रदेश और जिला स्तर के बड़े अधिकारियों के ‘पर्सनल मोबाइल नंबर’ वीआईपी लोगों, महाबलियों, राजनेताओं और उनके चहेतों के पास हमेशा उपलब्ध रहते हैं। रसूखदार लोग सीधे पर्सनल नंबर पर बात कर अपना काम करवा लेते हैं, जबकि आम आदमी सीयूजी नंबर की घंटी बजने का इंतजार ही करता रह जाता है।
जब फोन ही अटेंड नहीं होगा या कोई छोटा कर्मचारी बात को ऊपर तक नहीं पहुंचाएगा, तो जनता की आकस्मिक और गंभीर समस्याएं जस की तस बनी रहेंगी। अब तक का अनुभव यही बताता है कि जब भी किसी कर्मचारी ने फोन उठाया, उससे पीड़ित की प्रार्थना पत्र या समस्या का कोई ठोस हल नहीं निकला।
सरकार से सीधी मांग: अधिकारियों के पर्सनल नंबर किए जाएं सार्वजनिक!
जब सीयूजी नंबरों का कोई औचित्य नहीं रह गया है, तो सरकार को इस व्यवस्था में बड़ा बदलाव करना चाहिए। ‘ज़ी भारत न्यूज़ 24’ के माध्यम से हमारी सरकार से मांग है कि:
अधिकारी जिस भी जिले में तैनात हों, उनके पर्सनल या डायरेक्ट नंबर को सार्वजनिक (Public) करने का नियम बनाया जाए।
आम आदमी भी आकस्मिक और आपातकालीन स्थिति में सीधे सक्षम अधिकारी से बात कर सके, न कि किसी बिचौलिए या बाबू के भरोसे रहे।
सीयूजी नंबर न उठाने वाले लापरवाह अधिकारियों की जवाबदेही तय हो और उन पर सख्त कार्रवाई की जाए।
इस लचर व्यवस्था का सीधा असर सरकार की छवि पर पड़ता है, क्योंकि जब आम आदमी अपनी बात सीधे अधिकारी तक नहीं पहुंचा पाता, तो वह परेशान और आक्रोशित होता है। देखना यह है कि क्या शासन स्तर पर इस गंभीर समस्या का संज्ञान लेकर कोई ठोस कदम उठाया जाता है या फिर जनता ऐसे ही ‘नॉट रीचेबल’ सिस्टम के भरोसे भटकती रहेगी।
ब्यूरो रिपोर्ट: देवेश प्रताप सिंह राठौर
ज़ी भारत न्यूज़ 24




