भक्ति और भक्त,भगवान के ही रूप हैं
भिण्ड । महारानी अवंतीबाई मांगलिक भवन में आयोजित सप्तदिवसीय आध्यात्मिक श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के चतुर्थ दिवस कथा व्यास संत श्री पाठक जी महाराज ने कहा कि कथा,अमृत है परंतु इस अमृत का पान श्रोता तभी कर पाते हैं जब कथा कहने वाले स्वयं निष्काम भाव से कथा कहते हैं तब वह कथा अमृत के समान है। कहा की जिसकी ज्ञान की कथा अर्थात वेद- शास्त्रों को सुनने में रुचि है, वह सांसारिक कर्मों को करते हुए भी उसका कल्याण हो जाता है। जिसे परमात्मा की कथा में रुचि है वह शास्त्र सम्मत ही कर्म करता है। जिसका तन संसार में हो और मन भगवान में हो उसका कल्याण हो ही जाता है।
श्री पाठक ने कहा की मनुष्य के दुखों का कारण वह स्वयं ही है जब जीव भगवान की और पीठ व जगत की तरफ मुख कर लेता है, यहीं से जीव के दुखों का आरंभ हो जाता है। व्यास जी ने कहा की मनुष्य वस्त्र तो प्रतिदिन बदलता है यहां तक कि वृद्धावस्था पास आने पर बालों को सफेद से काले करने में लग जाते हैं परन्तु आप कितने भी बाल काले कर लो मृत्यु को मूर्ख नहीं बना सकते। श्वास का क्या भरोसा है आज चली जाए चाहे कल चली जाए श्वास का क्या भरोसा जाने कब चली जाए। इसीलिए आवश्यक है की अंतःकरण रूपी वस्त्र बदलने पर ध्यान दिया जाए परंतु मनुष्य उसका कभी प्रयास ही नहीं करता है। जड़भरत जी का प्रसंग कहते हुए व्यास जी ने बताया कि जिसने अपना सर्वस्व ईश्वर को सौंप दिया उसकी रक्षा स्वयं भगवान करते हैं।
महारानी अवंतीबाई मांगलिक भवन में आयोजित सप्तदिवसीय आध्यात्मिक श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के पंच्चम दिवस कथा व्यास संत श्री पाठक जी महाराज ने बताया की भगवान के भक्तों को कभी परेशान नहीं करना चाहिए जो भगवान के भक्त को परेशान करता है उसको कहीं भी ठिकाना नहीं मिलता है न ही इस लोक में और न परलोक में ही। भक्तों को तो भगवान की कथा सुनने और करने वाले ही अच्छे लगते हैं। एक भक्त वे होते हैं जो भगवान को याद करते हैं और एक भक्त वे होते हैं जिनको स्वयं भगवान याद करते हैं।
व्यास जी ने बताया की कोई बिना भक्त के अर्थात् बिना किसी संत से जुड़े हुए परमात्मा को मिलना चाहे यह बहुत ही दुर्लभ है। पाठक जी ने दृश्य की महत्ता को समझाते हुए बताया की जिस दृश्य को मनुष्य देखता है फिर उसी दृश्य का चिंतन करने लगता है और सांसारिक मनुष्य सही दृश्य का चिंतन न करते हुए नकारात्मक विचारों का चिंतन करने रुचि रखता है इसलिए हमें सदैव गलत दृश्य व गलत दृष्टि रखने से बचना चाहिए।
शुद्ध व पवित्र व्यक्ति अजामिल जी की कथा का
उदाहरण देते हुए समझाया।




