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जंतर-मंतर की अनुमति रद्द, रामलीला मैदान खाली कराया गया, सैकड़ों संगठनों के राष्ट्रीय अध्यक्षों को नजरबंद किया गया, दिल्ली में सवर्णों का महाकुंभ
दिल्ली | 8 मार्च 2026
सामान्य वर्ग और सनातन समाज से जुड़े अनेक संगठनों ने आरोप लगाया है कि आज 8 मार्च 2026 को दिल्ली के जंतर-मंतर और रामलीला मैदान पर प्रस्तावित शांतिपूर्ण सभा को प्रशासन द्वारा अनुमति देकर उसको रद्द करना उनकी लोकतांत्रिक आवाज को दबाने का प्रयास किया गया। रक्षक मोर्चा, नव युवा शक्ति संस्थान, राष्ट्रीय सवर्ण परिषद्, राष्ट्रीय हिन्दू युवा वाहिनी, हिन्दू सेना, जय हिन्दू मंच, हिन्दू महासभा, हिन्दू फोर्स, हिन्दू रक्षा दल, रक्षक मोर्चा, सुदर्शन वाहिनी, हिन्दू भगवा वाहिनी, तपस्वी आदर्श परिवार, सत्य सनातन सवर्ण मानव धर्म, हिन्दू रक्षा सेना, राष्ट्रवादी कर्णी सेना, कर्णी सेना, आजाद सेना, आजाद मंच, देवभूमि सवर्ण मोर्चा और राष्ट्रीय देवभूमि पार्टी, राष्ट्रवादी अधिकार पार्टी, ब्राह्मण महासभा, वैश्य महासभा, कायस्थ महासभा, सवर्ण मुस्लिम मंच सहित अनेक सनातनी-सवर्ण संगठनों ने यूजीसी (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता संवर्धन) नियमावली 2026 के विरोध में जंतर-मंतर और रामलीला मैदान पर शांतिपूर्ण सभा आयोजित करने की घोषणा की थी। इन संगठनों ने फरवरी 2026 में ही दिल्ली पुलिस को पत्र लिखकर 8 मार्च को सभा की अनुमति मांगी थी, किन्तु डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस, न्यू दिल्ली डिस्ट्रिक्ट के कार्यालय ने यह कहते हुए अनुमति अस्वीकार कर दी कि अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर वीवीआईपी मूवमेंट और अन्य कार्यक्रम निर्धारित हैं।
आंदोलनकारियों का कहना है कि पिछले वर्षों में महिला दिवस सहित कई अवसरों पर विभिन्न संगठनों को प्रदर्शन की अनुमति मिलती रही है यहां तक भी अभी इसी जंतर मंतर से भीम आर्मी ने यूजीसी बिल के समर्थन के बहाने ब्राह्मणों, क्षत्रिय, राजपूतों के खिलाफ खूब जहर उगला था , लेकिन इस बार शिष्टाचारी सभ्य सामान्य वर्ग के अधिकारों और मेरिट आधारित व्यवस्था के समर्थन में आयोजित सभा को रोक दिया गया। सवर्ण संगठनों ने आरोप लगाया कि वर्तमान भाजपा सरकार केवल वोट बैंक के लिए सवर्णों का दोहन करती है और सत्ता में आने के बाद उस वर्ग के तुष्टिकरण का प्रयास करती है जो इनके वोट शेयर के रूप में कन्वर्ट तक नहीं हो पाता है। प्रशासन ने एहतियात के तौर पर रामलीला मैदान को पहले से ही बैरिकेडिंग कर खाली करा लिया और जंतर-मंतर क्षेत्र में भारी पुलिस बल तैनात कर दिया। इसके साथ ही सभा से पहले ही विभिन्न संगठनों के कई प्रमुख नेताओं को उनके घरों पर पूर्व नजरबंदी में रखा गया या हिरासत में ले लिया गया। जानकारी के अनुसार वरिष्ठ अधिवक्ता अनिल मिश्रा, रक्षक मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित दुबे, रक्षक मोर्चा के राष्ट्रीय युवा अध्यक्ष ध्यानेंद्र शर्मा ,राष्ट्रीय सुरक्षा प्रभारी विक्रम सिंह ,राष्ट्रीय सवर्ण परिषद् के राष्ट्रीय अध्यक्ष पंकज धवरैय्या, देव सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष बृजभूषण सैनी, नव युवा शक्ति संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष कृष्णा त्यागी, राष्ट्रीय हिन्दू युवा वाहिनी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अरुण त्यागी, हिन्दू सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष विष्णु गुप्ता, जय हिन्दू मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष सुरेश शर्मा, हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुन्नालाल शर्मा, हिन्दू फोर्स के राष्ट्रीय अध्यक्ष दीपक सिंह, हिन्दू रक्षा दल की राष्ट्रीय अध्यक्ष पिंकी चौधरी, सुदर्शन वाहिनी के राष्ट्रीय अध्यक्ष आजाद विनोद, हिन्दू भगवा वाहिनी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अजय कुमार शर्मा, तपस्वी आदर्श परिवार के राष्ट्रीय अध्यक्ष योगेंद्र सिंह, सत्य सनातन सवर्ण मानव धर्म के राष्ट्रीय अध्यक्ष विशाल अरोड़ा, हिन्दू रक्षा सेना के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रवीण चौधरी, राष्ट्रवादी कर्णी सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष करण सिंह ठाकुर, क्षत्रिय कर्णी सेना के डाक्टर राज शेखावत, संगीता सिंह, दीपक सिंह मकराना, कली सेना के संस्थापक स्वामी आनंद स्वरूप महाराज, आजाद सेना के सामाजिक कार्यकर्ता, दिनेश रणेजा, सवर्ण आर्मी के नेता ठाकुर शिवम सिंह, देवभूमि सवर्ण मोर्चा और राष्ट्रीय देवभूमि पार्टी से जुड़े प्रतिनिधि, पूर्व प्रशासनिक अधिकारी और राम पार्टी के संस्थापक अलंकार अग्निहोत्री, आरडीपी हिमाचल प्रदेश से रूमित सिंह ठाकुर, यू एस राणा, त्रिभुवन शर्मा और एआईईएफ सहित अनेक नेताओं को या तो उनके आवासों पर नजरबंद कर दिया गया या पुलिस द्वारा हिरासत में लिया गया।
सूत्रों के अनुसार कई नेताओं को 7 मार्च की रात ही नोएडा, दिल्ली, राजस्थान, हरियाणा और उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा उठाया गया, जबकि जंतर-मंतर पहुंचने वाले अनेक कार्यकर्ताओं को रास्ते में ही रोककर बसों में बैठाकर विभिन्न पुलिस थानों में ले जाया गया। आंदोलन से जुड़े लोगों का दावा है कि इतनी बड़ी संख्या में लोगों को हिरासत में लिया गया कि कई स्थानों पर पुलिस थानों में जगह कम पड़ गई और प्रशासन को अस्थायी रूप से अन्य स्थानों पर भी लोगों को डिटेन कर रखना पड़ा।
संगठनों का कहना है कि यह आंदोलन केवल यूजीसी नियमावली 2026 की धारा 3(1)(C) के विरोध तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यापक रूप से समान अधिकारों और मेरिट आधारित व्यवस्था के समर्थन में चलाया जा रहा है। आंदोलनकारियों का आरोप है कि इस नियम में ‘जातिगत भेदभाव’ की परिभाषा अत्यंत अस्पष्ट और एकतरफा है, जिससे सामान्य वर्ग के छात्रों और युवाओं के खिलाफ संस्थागत उत्पीड़न के आरोप लगाए जा सकते हैं। राष्ट्रीय सवर्ण परिषद् और अन्य संगठनों द्वारा प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और भारत के मुख्य न्यायाधीश को सौंपे गए 11 सूत्रीय मांग-पत्र में कहा गया है कि यह नियम संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 में निहित समानता और जीवन के अधिकार की भावना के विपरीत है।
मांग-पत्र में यूजीसी नियमावली 2026 को वापस लेने, एससी-एसटी एक्ट की तुरंत गिरफ्तारी नीति और मुआवजा नीति में सुधार, आरक्षण सूचियों की समयबद्ध समीक्षा और डी-शेड्यूलिंग, अभारतीय मूल के पंथों को आरक्षण सूचियों से बाहर करने, एससी कोटे में क्रीमी लेयर लागू करने, वेतन एवं अवसरों की गणना में समानता सुनिश्चित करने, राष्ट्रीय ईडब्ल्यूएस आयोग के गठन, हिन्दू मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने, आईएएस संतोष वर्मा प्रकरण में कार्रवाई, गौ माता को राष्ट्र माता का संवैधानिक दर्जा देने तथा धार्मिक ग्रंथों के अपमान पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत कार्रवाई और रोहिणी आयोग की सिफारिशें तुरंत लागू करने की मांग भी शामिल है।
संगठनों ने यह भी कहा कि किसान आंदोलन, प्रो रिजर्वेशन मूवमेंट और सीएए विरोध जैसे प्रदर्शनों को लंबे समय तक अनुमति दी गई, जबकि सामान्य वर्ग के शांतिपूर्ण आंदोलन को रोक दिया गया, जो लोकतंत्र में समान अधिकारों के सिद्धांत के विपरीत है। आंदोलन से जुड़े नेताओं ने सरकार से मांग की है कि यूजीसी 2026 सहित सभी भेदभावपूर्ण नीतियों को तत्काल वापस लिया जाए, 11 सूत्रीय मांग-पत्र पर श्वेत-पत्र जारी किया जाए और नजरबंद सभी नेताओं एवं कार्यकर्ताओं को बिना शर्त रिहा किया जाए। उनका कहना है कि लोकतंत्र में हर वर्ग को अपनी बात रखने का अधिकार है और इस अधिकार को दबाने का कोई भी प्रयास स्वीकार नहीं किया जाएगा अन्यथा जो सत्ता में लाना जानते हैं वो सत्ता से हटाना भी जानते हैं।




