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कोलकाता/नई दिल्ली।
“पुरुष बली नहीं होत है, समय होत बलवान। भीलन लूटी गोपिका, वही अर्जुन वही बाण।”
यह पुरानी कहावत इस समय पश्चिम बंगाल की सियासत पर बिल्कुल सटीक बैठती है। राजनीति में कोई भी व्यक्ति या दल हमेशा शक्तिशाली या सत्ता के शिखर पर नहीं रहता। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस (TMC) सरकार के पिछले 15 वर्षों के कार्यकाल, कथित तानाशाही और तुष्टिकरण की नीतियों का जो परिणाम 4 मई 2026 को पूरे देश के सामने आया, उसने यह साबित कर दिया है कि अहंकार और अन्याय अधिक समय तक नहीं टिक सकते।
वर्तमान में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी पार्टी टीएमसी इस समय अपने इतिहास के सबसे बड़े राजनैतिक और आंतरिक संकट से गुजर रही है।
केंद्र से टकराव और हिंदू विरोधी नीतियों का मिला परिणाम
राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि लोकतंत्र में सरकारें बदलती रहती हैं, लेकिन राज्यों को केंद्र सरकार के साथ हमेशा तालमेल और समन्वय बनाकर चलना चाहिए क्योंकि राज्य भी देश का ही हिस्सा है। प्रधानमंत्री और केंद्र सरकार की जनहितकारी नीतियों को सिर्फ राजनैतिक द्वेष के कारण अपने राज्य में लागू न करना, हर बात पर विरोध करना और अपशब्दों का प्रयोग करना राजनीति की एक बेहद गलत रीती बन चुकी थी।
अहंकार तो रावण का भी नहीं रहा, उसका भी अंत हुआ। आरोप है कि ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी ने सत्ता के मद में चूर होकर जिस तरह बंगाल में एकतरफा हिंदू विरोधी कार्य किए और बांग्लादेशी घुसपैठियों को संरक्षण दिया, उसी का परिणाम 4 मई को जनता ने वोट की चोट से दे दिया। सत्ता हाथ से जाते ही शासन-प्रशासन का संरक्षण खत्म हो गया और जनता ने अभिषेक बनर्जी को चुनावी मैदान में बुरी तरह धो दिया।
टीएमसी में ऐतिहासिक बगावत: बैठक से 60 विधायक गायब
विधानसभा चुनाव में मिली करारी शिकस्त के बाद अब टीएमसी ताश के पत्तों की तरह बिखरती नजर आ रही है। ममता बनर्जी की कार्यशैली और उनके ‘अहंकार’ पर अब खुद उनकी ही पार्टी के भीतर से सवाल उठने लगे हैं।
हाल ही में ममता बनर्जी ने डैमेज कंट्रोल के लिए पार्टी विधायकों की एक बेहद महत्वपूर्ण बैठक बुलाई थी। लेकिन टीएमसी के लिए स्थिति तब बेहद शर्मनाक हो गई जब पार्टी के कुल 80 विधायकों में से केवल 20 विधायक ही बैठक में पहुँचे, जबकि लगभग 60 विधायक गायब रहे। इसे ममता बनर्जी के नेतृत्व के खिलाफ एक बहुत बड़ी खुली बगावत माना जा रहा है।
दो विधायक निष्कासित, अस्तित्व बचाने का संकट
विधायकों के इस बागी रुख को देखते हुए टीएमसी नेतृत्व ने आनन-फानन में बड़ी कार्रवाई करते हुए दो बागी विधायकों—संदीपन साहा और रिताब्रता बनर्जी को पार्टी से निष्कासित कर दिया है। हालांकि, इस कार्रवाई के बाद भी बगावत की आग ठंडी होती नहीं दिख रही है।
क्या वामदलों की तरह समाप्त हो जाएगी टीएमसी?
मौजूदा राजनैतिक हालातों को देखते हुए अब पश्चिम बंगाल में टीएमसी के लिए अपना अस्तित्व बचाना भी बेहद मुश्किल नजर आ रहा है। एक दौर था जब बंगाल में वामदल (लेफ्ट फ्रंट) का एकछत्र राज हुआ करता था और कोई सोच भी नहीं सकता था कि वे कभी खत्म होंगे, लेकिन आज वामदल शून्य पर सिमट चुके हैं। ठीक वही स्थिति आज टीएमसी की नजर आ रही है। इतिहास गवाह है कि जिस भी राजनैतिक दल ने राष्ट्रहित को छोड़कर केवल जात-पात, वोट बैंक और तुष्टिकरण की राजनीति की, उसका अंत निश्चित हुआ।
संपादकीय टिप्पणी:
“आज की राजनीति में देश गर्त में जाए या राज्य बर्बाद हो, कुछ दलों को इससे कोई सरोकार नहीं रह गया है। उनका एकमात्र मकसद सिर्फ और सिर्फ येन-केन-प्रकारेण सत्ता हथियाना है। लेकिन जनता अब जागृत हो चुकी है और बंगाल का यह घटनाक्रम सभी तानाशाह और अहंकारी नेताओं के लिए एक बड़ा सबक है।”
टीएमसी का अस्तित्व अब आगे बचेगा या नहीं, यह तो आने वाला समय ही बताएगा, लेकिन फिलहाल ममता दीदी का बंगाल गढ़ पूरी तरह से ढह चुका है।
लेख/विचार: देवेश प्रताप सिंह राठौर




