जी भारत न्यूज24
विशेष लेख: देवेश प्रताप सिंह राठौर
ब्यूरो रिपोर्ट: ज़ी भारत न्यूज़ 24
मेवाड़ | भारतीय इतिहास में वीरता, त्याग और अखंड स्वाभिमान के प्रतीक वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप की जयंती आज पूरे देश में हर्षोल्लास के साथ मनाई जा रही है। मेवाड़ के सिसोदिया वंश के इस महान योद्धा ने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए वह सब कुछ त्याग दिया जो एक राजा के लिए सुख-सुविधा का साधन होता है।
अजेय संकल्प और घास की रोटी
हल्दीघाटी के युद्ध (1576) के बाद जब स्थितियाँ प्रतिकूल हुईं, तब महाराणा प्रताप ने अरावली के जंगलों में शरण ली। साधनहीनता के उस दौर में उन्होंने महलों के ऐश्वर्य को त्याग कर घास की रोटियाँ खाना स्वीकार किया, लेकिन मुगल शासक अकबर के सामने कभी सिर नहीं झुकाया। उनका यह त्याग आज भी हर भारतीय के मन में देशभक्ति का संचार करता है।
रणक्षेत्र में पराक्रम की मिसाल
महाराणा प्रताप की शारीरिक शक्ति और युद्ध कौशल अद्भुत था। वे युद्ध के मैदान में लगभग 81 किलो का भाला और उतना ही भारी कवच पहनकर दुश्मन के छक्के छुड़ा देते थे। हल्दीघाटी के युद्ध में उनके द्वारा मुगल योद्धा बहलोल खान को घोड़े समेत दो टुकड़ों में चीर देना, उनकी अद्वितीय शक्ति का प्रमाण है।
चेतक की स्वामीभक्ति
प्रताप की गाथा उनके प्रिय घोड़े ‘चेतक’ के बिना अधूरी है। हल्दीघाटी के मैदान में घायल होने के बावजूद चेतक ने 25 फीट लंबे नाले को लांघकर अपने स्वामी की जान बचाई और स्वयं वीरगति को प्राप्त हुआ।
राजपूतों का गौरव और प्रेरणा
प्रताप ने प्रतिज्ञा ली थी कि जब तक चित्तौड़ मुक्त नहीं हो जाता, वे सोने-चांदी की थालियों में भोजन नहीं करेंगे और न ही महलों में रहेंगे। उनके इस आह्वान पर मेवाड़ के हर सरदार और भील योद्धाओं ने अपने रक्त की अंतिम बूंद तक साथ देने का वादा किया। आज महाराणा प्रताप का नाम केवल एक राजा का नाम नहीं, बल्कि स्वतंत्रता और आत्मसम्मान का एक विचार है।




