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पंकज त्रिपाठी
छल,कपट, ईर्ष्या करने वाले व्यक्ति का कभी मोक्ष नहीं होता
भिण्ड । हिंदू नव वर्ष एवं नवरात्रि के पावन अवसर पर गोरी सरोवर के किनारे श्री राम जानकी शाला मंदिर पर चल रही कथा के चतुर्थ दिवस पर अंतर्राष्ट्रीय भागवत आचार्य परम पूज्य संत श्री सर्वेश्वरी दासी जी ने कहा की माता-पिता और साधु – संतों का अपमान करने वाले व्यक्ति को नरक से भी कठिन यातनाएं भोगनी पड़ती हैं,और जो व्यक्ति छल कपट,ईर्ष्या भाव से अपने जीवन को जीता है और वह हमेशा अन्य मनुष्यों के प्रति छल कपट ईर्ष्या भाव द्वेष रखता है,ऐसा व्यक्ति कितनी भी पूजा पाठ और तपस्या करें,कितना भी दान पुण्य करें जो मनुष्य भूखे को भोजन नहीं खिला सकता है,उसका जीवन नरक के समान होता है,ईश्वर कभी ऐसे लोगों पर कृपा नहीं करते,गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामायण में स्पष्ट उल्लेख किया है कि भगवान को वही लोग प्रिय हैं जिनके निर्मल मन है और जो छल,कपट, ईर्ष्या से हमेशा दूर रहते हैं,जिनके हृदय में जनकल्याण की भावना हमेशा बनी रहती है और जो ईश्वरवादी होते हैं, जिन्हें ईश्वर पर पूर्ण विश्वास और श्रद्धा होती है, निश्चित तौर पर ऐसे मनुष्यों की ईश्वर सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते है। उन्होंने आगे कहा छल कपट ईर्ष्या में जीवन जीने वाले मनुष्य मृत्यु के उपरांत वर्षों तक उनकी आत्मा भटकती रहती है और उन्हें कठिन से कठिन यातनाओं का सामना करना पड़ता है,उन्होंने आगे कहा मनुष्य चैतन्य है और ईश्वर ने उसे सोचने और समझने की क्षमताएं प्रदान की है ,क्या सत्य है और क्या असत्य,मनुष्य को अपने कर्मों के आधार पर ही फल प्राप्त होता है जो जिस प्रकार का कार्य करता है उसको वैसा ही फल प्राप्त होता है।
उन्होंने आगे कहा हिरण्यकश्यप भगवान नारायण से द्वेष रखता था और उसकी पत्नी कयाधु निरंतर प्रभु श्रीनारायण की भक्ति उपासना में लीन रहती थी,जिसके फलस्वरुप हिरण्यकश्यप जैसे दुरात्मा के यहा पुण्यात्मा भक्त प्रहलाद का अवतरण हुआ,और भक्त प्रहलाद के अटूट विश्वास श्रद्धा के चलते प्रभु श्री नारायण ने खंबे से प्रकट होकर हिरण्यकश्यप जैसे दुरात्मा राक्षस का वध किया और अपने भक्त प्रहलाद को अपनी गोदी में बिठाकर लाड और दुलार किया, प्रभु की महिमा अपरम्पार है, जिसने यह सारी सृष्टि का निर्माण किया रक्त मांस और हड्डी का पुतला बनाकर उसमें अपना अंश सुशोभित कर इस मनुष्य जाति की रचना की,सतयुग,त्रेता, द्वापर और कलयुग हर युग में जब-जब भक्तों पर संकट पड़ा तब तब प्रभु ने स्वयं अवतार धारण कर अपने भक्तों के संकटों का निवारण किया। श्रद्धा और विश्वास के चलते ही मीरा को भगवान श्रीकृष्ण ने अपने दर्शन दिये, श्रद्धा और विश्वास के चलते स्वयं प्रभु ने मनुष्य रूप में जन्म लेकर अपनी भक्त शबरी के हाथों से झूठे बेर भी खाए थे, और वह विश्वास ही था जब एक दुरात्मा दुशासन भरी सभा में द्रोपदी जी का चीर हरने लगा, तो प्रभु की पूर्ण निष्ठा भक्ति और विश्वास के चलते ही द्रोपदी जी का चीर स्वतः ही बढ़ने लगा और दुरात्मा दुशासन की हार हुई।
उन्होंने आगे कहा भागवत कथा की श्रवण मात्र से मनुष्य के समूल पाप नष्ट हो जाते हैं और अगर मनुष्य धर्माचरण से अपना जीवन जीता है,तो वह निश्चित तौर पर अंतिम समय में परमात्मा की शरण में पहुंच जाता है, और उसको गोलोक धाम प्राप्त होता है,आज की पावन कथा में राजा बलि और भगवान के वामन अवतार की कथा को भक्त श्रोतागणों ने श्रवण की।




