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उन्नाव 16 नवंबर । उन्नाव की धरती पर जन्मे साहित्य के शिखर पुरुष देश के प्रसिद्ध मार्क्सवादी आलोचक और हिंदी हिंदी साहित्य के विद्वान डॉक्टर रामविलास शर्मा शोध एवं सृजन संस्थान के तत्वावधान में आयोजित “भक्ति आंदोलन, लोक जागरण और डॉक्टर रामविलास शर्मा का चिंतन” नामक साहित्य संगोष्ठी का आयोजन स्थानीय विशंभर दयाल त्रिपाठी पुस्तकालय उन्नाव में आयोजित किया गया । कार्यक्रम की अध्यक्षता राजनीतिज्ञ एवं सामाजिक कार्यकर्ता प्रोफेसर रमेश दीक्षित ने की तथा संचालन संस्था के मंत्री दिनेश क्रिमिनल द्वारा किया गया किया गया ।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि और इस अवसर पर डॉ रामविलास शर्मा शोध एवं सृजन संस्थान द्वारा सम्मानित वरिष्ठ साहित्यकार प्रोफेसर अवधेश प्रधान ने कहा की मार्क्स और एंगेल्स ने 1857 की घटनाओं को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के रूप में परिभाषित करने से पूर्व ही डॉक्टर रामविलास शर्मा ने अपने लेखन के माध्यम से भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को प्रथम सोपान के रूप में देखने का काम किया था । उन्होंने कहा कि उनकी विद्वता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देश के पूर्व राष्ट्रपति डॉ शंकर दयाल शर्मा को लखनऊ यूनिवर्सिटी के अंदर फ्रेंच भाषा को सिखाने का काम प्रोफेसर शर्मा ने किया था । प्रोफेसर प्रधान ने कहा कि भक्ति कालीन युग का साहित्य न केवल देश की आध्यात्मिक चेतना के स्वर को प्रस्तुत करता है बल्कि तत्कालीन सत्ता और सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध विद्रोह का स्वर भी उच्चरित करता है । समारोह को संबोधित करते हुए वरिष्ठ एवं साहित्यकार सुभाष राय ने भक्तिकालीन महिला कवियों के साहित्य पर डॉ शर्मा के साहित्य पर विस्तार से चर्चा करते हुए तत्कालीन साहित्य को जातीय, सामाजिक, सामंती तथा राजनीतिक सत्ता की कुरीतियों के विरुद्ध जन जागरण बताया ।
समारोह को संबोधित करने वाले तथा उपस्थित लोगों में प्रमुख रूप से
प्रोफेसर रमाशंकर सिंह, प्रोफेसर पुष्पा बरनवाल, डॉ रामनरेश, प्रोफेसर आनंद शुक्ला, सईद नकवी, महेश शर्मा, सुशील मिश्रा, अखिलेश तिवारी, डॉ विनीत तिवारी, संजीव श्रीवास्तव, नरेश पाल सिंह, संजय कुमार जायसवाल, नसीर अहमद, अशोक पांडे, अनिल पांडे, अर्चना सरल वर्मा, पुस्तकालाध्यक्ष सुरभि श्रीवास्तव आदि लोग प्रमुख रूप से मौजूद थे ।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि और इस अवसर पर डॉ रामविलास शर्मा शोध एवं सृजन संस्थान द्वारा सम्मानित वरिष्ठ साहित्यकार प्रोफेसर अवधेश प्रधान ने कहा की मार्क्स और एंगेल्स ने 1857 की घटनाओं को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के रूप में परिभाषित करने से पूर्व ही डॉक्टर रामविलास शर्मा ने अपने लेखन के माध्यम से भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को प्रथम सोपान के रूप में देखने का काम किया था । उन्होंने कहा कि उनकी विद्वता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देश के पूर्व राष्ट्रपति डॉ शंकर दयाल शर्मा को लखनऊ यूनिवर्सिटी के अंदर फ्रेंच भाषा को सिखाने का काम प्रोफेसर शर्मा ने किया था । प्रोफेसर प्रधान ने कहा कि भक्ति कालीन युग का साहित्य न केवल देश की आध्यात्मिक चेतना के स्वर को प्रस्तुत करता है बल्कि तत्कालीन सत्ता और सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध विद्रोह का स्वर भी उच्चरित करता है । समारोह को संबोधित करते हुए वरिष्ठ एवं साहित्यकार सुभाष राय ने भक्तिकालीन महिला कवियों के साहित्य पर डॉ शर्मा के साहित्य पर विस्तार से चर्चा करते हुए तत्कालीन साहित्य को जातीय, सामाजिक, सामंती तथा राजनीतिक सत्ता की कुरीतियों के विरुद्ध जन जागरण बताया ।
समारोह को संबोधित करने वाले तथा उपस्थित लोगों में प्रमुख रूप से
प्रोफेसर रमाशंकर सिंह, प्रोफेसर पुष्पा बरनवाल, डॉ रामनरेश, प्रोफेसर आनंद शुक्ला, सईद नकवी, महेश शर्मा, सुशील मिश्रा, अखिलेश तिवारी, डॉ विनीत तिवारी, संजीव श्रीवास्तव, नरेश पाल सिंह, संजय कुमार जायसवाल, नसीर अहमद, अशोक पांडे, अनिल पांडे, अर्चना सरल वर्मा, पुस्तकालाध्यक्ष सुरभि श्रीवास्तव आदि लोग प्रमुख रूप से मौजूद थे ।




