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हिंदी भाषा सबको जोड़ने का कार्य करती है: प्रो. मुकेश पांडेय
हिंदी के बिना देश की यात्रा अधूरी है: प्रो. रचना विमल
केंद्रीय हिंदी निदेशालय, भारत सरकार तथा बुंदेलखंड विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित तीन दिवसीय अध्ययन यात्रा का शुभारंभ
दक्षिण भारत के 50 विद्यार्थी समझेंगे बुंदेलखंड की साहित्य और संस्कृति
उत्तर प्रदेश झांसी केंद्रीय हिंदी निदेशालय, शिक्षा मंत्रालय, उच्चतर शिक्षा विभाग, भारत सरकार द्वारा संचालित छात्र अध्ययन यात्रा का शुभारंभ बुंदेलखंड विश्वविद्यालय में हुआ। त्रिदिवसीय यात्रा का शुभारंभ बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मुकेश पांडेय तथा दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रो. रचना विमल द्वारा किया गया। माल्यार्पण और सरस्वती वंदना के उपरांत विभिन्न राज्यों से पधारे विद्यार्थियों का पारंपरिक बुंदेली तरीके से तिलक लगाकर स्वागत किया गया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मुकेश पांडेय ने कहा कि विश्वविद्यालय के लिए यह गौरव क्षण का है दक्षिण भारत के लोग बुंदेलखंड के बारे में जानना चाहते हैं. भारत यूनिटी इन डायवर्सिटी का सबसे अच्छा उदाहरण हैं। जब हम उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम की ओर जाते हैं तो हम देखते हैं कि हर थोड़ी दूर पर भाषा बदलती है, बोल- चाल का तरीका बदलता है, खान-पान बदलता है, सब बदल जाता है। हिंदी भाषा सबको जोड़ने का काम करती है। हिंदी ऐसी भाषा है जो हर तरह से स्वीकार्य है, लिखने और बोलने में आसान है। बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय में भी हिंदी और संस्कृत भाषा को बढ़ावा देने के लिए काम किया जा रहा है।
ये बदलता भारत है इसे आप सब देख सकते हैं। हम केंद्रीय हिंदी निदेशालय के आभारी है कि उन्होंने बुंदेलखंड यूनिवर्सिटी को इसके लिए चुना।
मुख्य वक्ता के रूप में मौजूद दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रो. रचना विमल ने कहा कि यह यात्रा कोई नई यात्रा नहीं है। भारत सरकार ने आजादी के समय देश की एकता बनाए रखने के लिए सांस्कृतिक यात्रा का आरंभ किया था। ऐसे ही एक कार्यक्रम में मैं ओड़िशा गई थी जहां हम मशहूर साहित्यकार प्रतिभा जी से मिली थी। उनके द्रौपदी उपन्यास ने मुझे बहुत प्रभावित किया। ये उत्तर से दक्षिण की यात्रा वैदिक काल से शुरू हो गई थी। महर्षि अगस्त पहली बार विंध्याचल पार कर दक्षिण गए थे। राम और कृष्ण भारत में दो ऐसे महापुरूष हुए जो संपूर्ण भारत तक अपना यश पहुंचा सके और आज भी देश के हर हिस्से में जाने जाते हैं। आदि शंकराचार्य ने भी भारत की संस्कृति को अखंड रखने के लिए कई यात्राएं की हैं। हमारे यहां जो धारण करने योग्य है वही धर्म है। इस देश को अगर अपनी संस्कृति से जोड़ना है तो धर्म गुण की स्थापना जरूरी है। चारों धाम की यात्रा आपको इस देश की संस्कृति से जोड़ती है। भाषा का पहले कोई झगड़ा नहीं था। 11वीं शताब्दी तक संस्कृत देश की भाषा थी मगर जब देश में अंग्रेजों का आगमन शुरू हुआ तब उन्होंने हमें क्षेत्र के आधार पर बांटना शुरू किया। जब भी किसी का मनोबल तोड़ना हो, आपको नीचा दिखाना हो। वहां पहले आपकी भाषा में कमी निकली जाती। जहां जहां विदेशी गए वहां वहां संस्कृत छूटती गई और बोलिया प्रचलित हो गईं। अगर अपनी तरक्की के लिए अपनी ही भाषा को छोड़ना पड़े तो इस से गलत बात क्या ही हो सकती है। हिंदी के बिना देश की यात्रा हो ही नहीं सकती।
विशिष्ट वक्ता बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के परिक्षा नियंत्रक/कुलसचिव राज बहादुर ने कहा कि भाषा भावों को व्यक्त करने का माध्यम है। यह मुल्क बहुत बड़ा है और यहां कई भाषाएं हैं। जब हिंदी से हमारा परिचय होगा तभी हम अन्य भाषाओं के साहित्य तक पहुंच सकते हैं। बुन्देलखण्ड की इस धरती पर कई राजाओं ने राज किया। यहां के किले, बांध, जलविद्युत परियोजना आदि यहां इतिहास का गौरव हैं। यहां के भोजन में भी आपको बदलाव देखने को मिलता है। यहां के लोक नृत्य, राई, ढीमरयाई, नवरता, दिवारी, आल्हा गायन आदि मन मोहने वाले हैं। यहां की वीरांगना झलकारी बाई ने अपने प्राण त्याग कर रानी की जन बचाई थी। रामचरितमानस के रचयिता तुलसीदास यहीं चित्रकूट में पैदा हुए थे। मित्रता का भाव ही हमें मानवता की ओर ले जाएगा। निदेशालय से पधारे सुनील ने यात्रा के महत्व के बारे में बताया।
यात्रा का स्वागत करते हुए कला संकाय के अध्यक्ष प्रो. मुन्ना तिवारी ने कहा कि इन छात्रों में हमें हिंदी और बुन्देली दोनों का सामंजस्य बनाना है। इनको साहित्य से परिचय के साथ साथ साहित्य की यात्रा भी कराई जाएगी। जिसके अंतर्गत पहले जिस नाम पर हम झांसी को जानते है रानी लक्ष्मी बाई का किला दिखाया जाएगा। इसके बाद चिरगांव जहां मैथिली शरण गुप्त अपनी साहित्य की सृजना के उच्चतम स्तर तक पहुंचे वह स्थल दिखाया जाएगा। एक आदमी गांव में रह कर कितना बेहतरीन कार्य कर सकता है इससे परिचित करवाया जाएगा। इसके अतिरिक्त ओरछा का केशव महल जहां केशव दास जी ने रहकर कार्य किया और अपनी रचनाएं पूरी की। साथ ही इस यात्रा में हम छात्रों को ओरछा में राम राजा सरकार के दर्शन कराएंगे। जहां छात्र ये जान पाएंगे कि यह राम राजा सरकार की यह प्रजा आज भी उन राजा से प्रशासित होती है। अतिथियों के प्रति आभार डॉ. किरण झा ने ज्ञापित किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. आशीष दिक्षित द्वारा किया गया। उद्घाटन कार्यक्रम के उपरांत सभी विद्यार्थियों ने डॉ. सुनीता वर्मा द्वारा निर्मित बुंदेली व्यंजन का स्वाद चखा। इस अवसर पर डॉ. प्रेमलता श्रीवास्तव, डॉ. सुधा दीक्षित, डॉ. द्युति मालिनी, डॉ. पुनीत श्रीवास्तव, डॉ. बी. बी. त्रिपाठी, रिचा सेंगर, गरिमा, कपिल शर्मा, आकांक्षा सिंह, अतीत विजय आदि उपस्थित रहे।*हिंदी के बिना देश की यात्रा अधूरी है: प्रो. रचना विमल
केंद्रीय हिंदी निदेशालय, भारत सरकार तथा बुंदेलखंड विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित तीन दिवसीय अध्ययन यात्रा का शुभारंभ
दक्षिण भारत के 50 विद्यार्थी समझेंगे बुंदेलखंड की साहित्य और संस्कृति
केंद्रीय हिंदी निदेशालय, शिक्षा मंत्रालय, उच्चतर शिक्षा विभाग, भारत सरकार द्वारा संचालित छात्र अध्ययन यात्रा का शुभारंभ बुंदेलखंड विश्वविद्यालय में हुआ। त्रिदिवसीय यात्रा का शुभारंभ बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मुकेश पांडेय तथा दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रो. रचना विमल द्वारा किया गया। माल्यार्पण और सरस्वती वंदना के उपरांत विभिन्न राज्यों से पधारे विद्यार्थियों का पारंपरिक बुंदेली तरीके से तिलक लगाकर स्वागत किया गया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मुकेश पांडेय ने कहा कि विश्वविद्यालय के लिए यह गौरव क्षण का है दक्षिण भारत के लोग बुंदेलखंड के बारे में जानना चाहते हैं. भारत यूनिटी इन डायवर्सिटी का सबसे अच्छा उदाहरण हैं। जब हम उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम की ओर जाते हैं तो हम देखते हैं कि हर थोड़ी दूर पर भाषा बदलती है, बोल- चाल का तरीका बदलता है, खान-पान बदलता है, सब बदल जाता है। हिंदी भाषा सबको जोड़ने का काम करती है। हिंदी ऐसी भाषा है जो हर तरह से स्वीकार्य है, लिखने और बोलने में आसान है। बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय में भी हिंदी और संस्कृत भाषा को बढ़ावा देने के लिए काम किया जा रहा है।
ये बदलता भारत है इसे आप सब देख सकते हैं। हम केंद्रीय हिंदी निदेशालय के आभारी है कि उन्होंने बुंदेलखंड यूनिवर्सिटी को इसके लिए चुना।
मुख्य वक्ता के रूप में मौजूद दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रो. रचना विमल ने कहा कि यह यात्रा कोई नई यात्रा नहीं है। भारत सरकार ने आजादी के समय देश की एकता बनाए रखने के लिए सांस्कृतिक यात्रा का आरंभ किया था। ऐसे ही एक कार्यक्रम में मैं ओड़िशा गई थी जहां हम मशहूर साहित्यकार प्रतिभा जी से मिली थी। उनके द्रौपदी उपन्यास ने मुझे बहुत प्रभावित किया। ये उत्तर से दक्षिण की यात्रा वैदिक काल से शुरू हो गई थी। महर्षि अगस्त पहली बार विंध्याचल पार कर दक्षिण गए थे। राम और कृष्ण भारत में दो ऐसे महापुरूष हुए जो संपूर्ण भारत तक अपना यश पहुंचा सके और आज भी देश के हर हिस्से में जाने जाते हैं। आदि शंकराचार्य ने भी भारत की संस्कृति को अखंड रखने के लिए कई यात्राएं की हैं। हमारे यहां जो धारण करने योग्य है वही धर्म है। इस देश को अगर अपनी संस्कृति से जोड़ना है तो धर्म गुण की स्थापना जरूरी है। चारों धाम की यात्रा आपको इस देश की संस्कृति से जोड़ती है। भाषा का पहले कोई झगड़ा नहीं था। 11वीं शताब्दी तक संस्कृत देश की भाषा थी मगर जब देश में अंग्रेजों का आगमन शुरू हुआ तब उन्होंने हमें क्षेत्र के आधार पर बांटना शुरू किया। जब भी किसी का मनोबल तोड़ना हो, आपको नीचा दिखाना हो। वहां पहले आपकी भाषा में कमी निकली जाती। जहां जहां विदेशी गए वहां वहां संस्कृत छूटती गई और बोलिया प्रचलित हो गईं। अगर अपनी तरक्की के लिए अपनी ही भाषा को छोड़ना पड़े तो इस से गलत बात क्या ही हो सकती है। हिंदी के बिना देश की यात्रा हो ही नहीं सकती।
विशिष्ट वक्ता बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के परिक्षा नियंत्रक/कुलसचिव राज बहादुर ने कहा कि भाषा भावों को व्यक्त करने का माध्यम है। यह मुल्क बहुत बड़ा है और यहां कई भाषाएं हैं। जब हिंदी से हमारा परिचय होगा तभी हम अन्य भाषाओं के साहित्य तक पहुंच सकते हैं। बुन्देलखण्ड की इस धरती पर कई राजाओं ने राज किया। यहां के किले, बांध, जलविद्युत परियोजना आदि यहां इतिहास का गौरव हैं। यहां के भोजन में भी आपको बदलाव देखने को मिलता है। यहां के लोक नृत्य, राई, ढीमरयाई, नवरता, दिवारी, आल्हा गायन आदि मन मोहने वाले हैं। यहां की वीरांगना झलकारी बाई ने अपने प्राण त्याग कर रानी की जन बचाई थी। रामचरितमानस के रचयिता तुलसीदास यहीं चित्रकूट में पैदा हुए थे। मित्रता का भाव ही हमें मानवता की ओर ले जाएगा। निदेशालय से पधारे सुनील ने यात्रा के महत्व के बारे में बताया।
यात्रा का स्वागत करते हुए कला संकाय के अध्यक्ष प्रो. मुन्ना तिवारी ने कहा कि इन छात्रों में हमें हिंदी और बुन्देली दोनों का सामंजस्य बनाना है। इनको साहित्य से परिचय के साथ साथ साहित्य की यात्रा भी कराई जाएगी। जिसके अंतर्गत पहले जिस नाम पर हम झांसी को जानते है रानी लक्ष्मी बाई का किला दिखाया जाएगा। इसके बाद चिरगांव जहां मैथिली शरण गुप्त अपनी साहित्य की सृजना के उच्चतम स्तर तक पहुंचे वह स्थल दिखाया जाएगा। एक आदमी गांव में रह कर कितना बेहतरीन कार्य कर सकता है इससे परिचित करवाया जाएगा। इसके अतिरिक्त ओरछा का केशव महल जहां केशव दास जी ने रहकर कार्य किया और अपनी रचनाएं पूरी की। साथ ही इस यात्रा में हम छात्रों को ओरछा में राम राजा सरकार के दर्शन कराएंगे। जहां छात्र ये जान पाएंगे कि यह राम राजा सरकार की यह प्रजा आज भी उन राजा से प्रशासित होती है। अतिथियों के प्रति आभार डॉ. किरण झा ने ज्ञापित किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. आशीष दिक्षित द्वारा किया गया। उद्घाटन कार्यक्रम के उपरांत सभी विद्यार्थियों ने डॉ. सुनीता वर्मा द्वारा निर्मित बुंदेली व्यंजन का स्वाद चखा। इस अवसर पर डॉ. प्रेमलता श्रीवास्तव, डॉ. सुधा दीक्षित, डॉ. द्युति मालिनी, डॉ. पुनीत श्रीवास्तव, डॉ. बी. बी. त्रिपाठी, रिचा सेंगर, गरिमा, कपिल शर्मा, आकांक्षा सिंह, अतीत विजय आदि उपस्थित रहे।
देवेश प्रताप सिंह राठौर,ब्यूरो चीफ उत्तर प्रदेश




