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झांसी। स्त्री विमर्श: दशा और दिशा विषय पर हुई संगोष्ठी और बही काव्यरस की धार
झाँसी की रानी धन्य, झाँसी को पानी है : अरुण कुमार हिंगवासिया ‘अरुण’
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के उपलक्ष्य में बूटा परिसर ने हिन्दी विभाग में विश्वविद्यालय मे कार्यरत महिला शिक्षिकाओं का सम्मान किया तथा उन्हे सम्मान पत्र,अंगवस्त्र तथा पुष्पगुच्छ देकर राष्ट्र के प्रति मातृ शक्ति के अमूल्य योगदान को नमन किया। इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रो॰ अर्चना वर्मा ने कहा कि महिलाएं भी पुरुषो की भांति समाज का महत्वपूर्ण अंग हैं जिन्हें अवसर दिये जाने पर वे भी समाज की महत्वपूर्ण धुरी सिद्ध हो सकती हैं। अनेक महिलाओं ने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी अमिट छाप छोड़ी है। वास्तव में पुरुष और महिला एक दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। प्रसन्नता की बात है कि पुरुष भी आज महिलाओं को स्पेस दे रहे हैं और उनकी प्रगति में सहभागी बन रहे है। कार्यक्रम को डॉ नूपुर गौतम, प्रो सुनील काबिया, प्रो सी बी सिंह, प्रो वी के सिंह, नवीन चन्द पटेल, डॉ सुनीता वर्मा, डॉ प्रेमलता, डॉ शिप्रा गुप्ता वशिष्ठ ने भी संबोधित किया। इस अवसर पर सम्मानित होने वाली शिक्षिकाओं में प्रो अर्चना वर्मा, डॉ अमरजोत वर्मा, डॉ नूपुर गौतम, डॉ सुनीता वर्मा, डॉ शिप्रा गुप्ता वशिष्ठ, डॉ सुनीता कपूर, डॉ प्रेमलता, डॉ द्युति मालिनी, डॉ सुधा दीक्षित, डॉ रेणु शर्मा, डॉ ऋचा सेंगर, डॉ गरिमा कुशवाहा, ऋतिका यादव, मंजरी श्रीवास्तव और आकांक्षा सिंह शामिल हैं।
कार्यक्रम के दूसरे चरण में आयोजित कवयित्री सम्मेलन में अनेक कवयित्रियों नें काव्यरस की फुहार से सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। कवयित्री प्रगति शंकर सहाय ने नारी की महानता का वर्णन करते हुए कहा –
नारी को कमजोर न समझो, अबला न बेचारी है।
मिली चुनौती जीवनपथ की, हँसकर सब स्वीकारी है।।
नारी को कमजोर न समझो, जीवन के आयामो में।
कान्हा के छप्पन भोगो में, एक तुलसीदल भारी है।।
रमा शुक्ला सखी ने वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई को नमन करते हुए कहा-
वीरांगना की वीरता का, है न कोई सानी,
आजादी भारतवर्ष की है, जिनकी अमिट निशानी।
तोड़ गुलामी की जंजीरें, सीना तान लड़ी थी,
प्यारी झाँसी मैं न दूँगी, यह हुंकार भरी थी।
मीरा अग्रवाल ने नारी के रौद्ररूप की चर्चा करते हुए कहा-
दुर्गा काली चंडी रणचंडी बनती नारी,
नहीं समझे क्यों बनती काली नारी।
पहले सौ सौ बार बलि पर चढ़ती नारी,
तब बनती एक काली एक दुर्गा नारी।
डॉ शिप्रा गुप्ता वशिष्ठ ने स्वरचित WHAT IF का पाठ किया, जो संघर्षों मे भी नारी को प्रेरणा का पाठ पढ़ाती है।
अरुण कुमार हिंगवासिया ‘अरुण’ ने मातृशक्ति की ओजस्विता की प्रतीक महारानी लक्ष्मीबाई की वीरता को प्रणाम करते हुए बुन्देली कविता में कहा –
धन्य री मर्दानी गुणखानी भवानी सी,
झाँसी की रानी धन्य, झाँसी को पानी है
वीरता सुहानी सब खों, रानी मर्दानी की,
वीरता बखानी सोई, धन्य भई बानी है।
डॉ द्युति मालिनी ने वक्त तो लगता है शीर्षक से गज़ल प्रस्तुत की-
ख्वाब को अपने सच करने में, वक़्त तो लगता है,
नई ऊंचाई तक जाने में, वक्त तो लगता है।
पाठ की बात तो नहीं है, हमको पूरी पुस्तक पढ़ना है,
फिर गहराई तक जाने में, वक़्त तो लगता है।
इस अवसर पर प्रो अर्चना वर्मा, प्रो एस के कटियार, प्रो सुनील काबिया, प्रो सीबी सिंह, प्रो वीके सिंह, डॉ संजय निबोरिया, डॉ नूपुर गौतम, डॉ अमरजोत वर्मा, नवीन चन्द पटेल, डॉ शिप्रा गुप्ता वशिष्ठ, डॉ सुनीता कपूर, डॉ सुनीता वर्मा, डॉ प्रेमलता, डॉ सुधा दीक्षित, डॉ द्युति मालिनी, डॉ ऋचा सेंगर, डॉ गरिमा कुशवाहा, डॉ रेणु शर्मा, ऋतिका यादव, मंजरी श्रीवास्तव, आकांक्षा सिंह, डॉ आशीष दीक्षित, डॉ जोगेन्द्र सिंह, पुष्पेंद्र कुमार, अभिषेक बबेले, प्रिया गुप्ता, मनीष मण्डल, विशाल यादव सहित विभाग के अनेक शिक्षक, शोधार्थी और छात्र छात्राएँ उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन प्रो. पुनीत बिसारिया ने किया और प्रो. वी.के. सिंह ने सभी के प्रति आभार जताया।
देवेश प्रताप सिंह राठौर,ब्यूरो चीफ उत्तर प्रदेश




