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डॉ. अंशुमान अग्निहोत्री
देश में महिलाओं के उत्पीड़न, दुष्कर्म और घरेलू हिंसा जैसी मानवता को कलंकित करने वाली घटनाएँ समूचे राष्ट्र को शर्मसार कर रही हैं। ऐसी अमानवीय वारदातें हर संवेदनशील नागरिक की अंतरात्मा को झकझोर देती हैं। यह प्रश्न अब बेहद विकराल रूप ले चुका है कि क्या यह केवल कमजोर सरकारी तंत्र और लचर सुरक्षा व्यवस्था का परिणाम है, या फिर हमारी सामाजिक संवेदनहीनता भी उतनी ही जिम्मेदार है?
कानून-व्यवस्था को कोसने और कड़े नियमों की मांग के साथ-साथ हमें अपनी सोच और सामाजिक परिवेश को भी टटोलना होगा। अक्सर किसी वीभत्स घटना के बाद जनाक्रोश सड़कों पर दिखाई देता है, परंतु समय बीतते ही समाज फिर उसी ढर्रे पर लौट आता है। पश्चिमी अंधानुकरण के कारण हम अपनी मूल संस्कृति और नैतिक मूल्यों से दूर होते जा रहे हैं। फिल्मों और विज्ञापनों में स्त्री के बाजारीकरण ने उसे उपभोग की वस्तु समझने की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया है।
संस्कारों की दिशा और सामाजिक रवैया
हम अक्सर बेटियों के पहनावे, आचरण और बाहर निकलने पर बंदिशें लगाते हैं, जबकि वास्तविक आवश्यकता बेटों को नारी-सम्मान के संस्कार देने की है। महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध न केवल प्रशासनिक विफलता हैं, बल्कि समाज के नीति-नियंताओं के दावों पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करते हैं। आज भी ढेरों महिलाएँ चारदीवारी के भीतर घरेलू हिंसा सहने को मजबूर हैं, जहाँ बुद्धिजीवी आधुनिक जीवनशैली को दोष देकर अपनी जिम्मेदारी से इतिश्री कर लेते हैं।
विडंबना यह है कि घटना के बाद अक्सर पीड़िता से ही सवाल पूछे जाते हैं, उसे उपहास का पात्र बनाया जाता है और अंततः उसे ही लज्जित होना पड़ता है। यह घृणित रवैया पीड़िता को मानसिक कुंठा की ओर धकेलता है और अपराधियों का मनोबल बढ़ाता है।
ठोस बदलाव की आवश्यकता
मानसिकता में परिवर्तन: हमें यह स्पष्ट स्वीकारना होगा कि उत्पीड़न पीड़िता के लिए नहीं, बल्कि अपराधी और समाज के लिए शर्म का विषय है।
समझौतों पर रोक: मामलों में लीपापोती करने या पीड़िता पर बेतुके सामाजिक समझौते थोपने वाली पंचायतों और तथाकथित अगुओं पर सख्त कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।
सामाजिक बहिष्कार: जब तक समाज दुराचारियों का पूर्ण बहिष्कार नहीं करेगा, तब तक केवल कागजी कानूनों से नारी सुरक्षा संभव नहीं है।
हमारी संस्कृति में नारी सदैव वंदनीय रही है। केवल सरकारी तंत्र के भरोसे रहने के बजाय जब तक समाज स्वयं स्त्री के स्वाभिमान और आत्मसम्मान की रक्षा का संकल्प नहीं लेगा, तब तक वास्तविक सुरक्षा का वातावरण निर्मित नहीं हो सकता।




